तन्हाई...

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तन्हाई...

तन्हाई

रोज़ शाम को
दिन भर की दुनियादारी से
निपटने के बाद
बैठता हूँ जब
अपने नीम अंधेरे कम

सफर.....

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सफर.....

सफर....

गुजरता हूँ मैं जब भी
सुनसान राहों में
कहीं से आ जाती है
कूँहू की आवाज,
हाँ रूक जाते है कदम

तु कुछ भी नही…!!!

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तु कुछ भी नही…!!!

आँसू...

वैसे तो दर्द के कई रुप होते हैं,मगर दर्द कैसा भी हो आँसू बहते ही बहते हैं,हर आँसुओं की अपनी

मुहब्बत में मिटकर फना हो गया हूँ .

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12 -May-2017 Madan Saxena Lonely Poems 0 Comments  8 Views
मुहब्बत में मिटकर फना हो गया हूँ .




घर को जाता हूँ मैं...।

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घर को जाता हूँ मैं...।

घर को जाता हूँ...

घर को जाता हूँ मैं...।

सजानी हैं मुझे,
करीनें से रिश्तों की
कुछ ईंटों को फिर से

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