उलझन एक युवा की

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16 -May-2017 Kumar Harsh Youngster Poems 0 Comments  53 Views
Kumar Harsh

हाए ये उलझन!
उलझन है की, कहाँ जाएँ?
कहा जाएँ, के फिर न पचताएं
दुनिया से हम भागे आगे,
इस असमंजस की स्थिति से कोई हमे यहां से लेकर भागे
हाए ये उलझन ।।

है ये उलझन ,बड़ी "दुखदाई "
इसमे दर्द और पीड़ा समाई,
इस से कोई निकालो भाई ,
आगे करनी है, अब कमाई।
हाए ये उलझन।।

अब तक पल रहे थे ,टुकड़ो पे
अब टुकड़े बनाने है
इस गंदी ,भ्रष्टाचारी दुनिया मे अब अपना फ़र्ज़ निभाना है
अब अपनो का क़र्ज़ चुकाना है।
हाए ये उलझन।।

उलझन एक युवा की


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