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आज मैंने अपने हाथ को देखा

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01 -Nov-2015 Sunny Kapoor Social Issues Poems 0 Comments  925 Views
Sunny Kapoor

आज मैंने अपने हाथ को देखा
पाँचो उँगलियों के साथ को देखा

यकायक मिल पड़ा ये एक परिवार के जैसा
माता पिता और बच्चों के प्यार के जैसा

यहाँ एक ऊँगली दूसरी को छोड़ नहीं सकती
वहाँ आज की रस्मे बच्चों को मात पिता से जोड़ नहीं सकती

यहाँ एक ऊँगली कट जाए तो दर्द का चरम हो जाता है
वहाँ बेटा माँ बाप को निकाल के बेशर्म हो जाता है

यहाँ पाँचो ऊँगली एक हो तो पंजा कहलाता है
तड़पते माँ बाप को छोड़ बेटा संस्कारो में गंजा कहलाता है

कहते है हाथो की लकीरे इंसान की तक़दीरें बनाती है
प्यार की तहरीरें परिवार का मुक़द्दर सजाती है

आज क्यूँ हाथ को लकवा हो रहा है
क्यूँ बेटा माँ बाप से रूसवा हो रहा है

क्या इसी का नाम संस्कारो का नवीनीकरन है
या ये हमारे बुजुर्गो के अधिकारों का हरन है

सारी उँगलियों को मिला के बंद कर लो मुट्ठी
कोई आंच न आएगी कुटुंब पर ये ही है जीवन की घुट्टी

आज मैंने अपने हाथ को देखा
पाँचो उँगलियों के साथ को देखा ।।



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