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"Aatankwadi"

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15 -Nov-2015 kapil garg Terrorism poems 1 Comments  4,708 Views
kapil garg

आज फिर एक बार,इन्सान नही इंसानियत को मार दिया गया
क्या कसूर था उन बेचारो का,जिनका नरसंहार कर दिया गया
वही मुह पर नकाब लगाए कुछ जानवर दिख रहे थे
सच कहू तो मानवता के कातिल दिख रहे थे
कोई बच्चा निकला था घर से,स्कुल जाने को
तो कोई निकला था,अपनों के लिए निवाला लाने को
कोई मुसाफिर निकला ,अपनी मंजिल पाने को
मगर हर किसी का सपना होगा घर लौट जाने को
पर उनके सपनो में आहट देने कुछ लोग चले आये थे
बताओ मुझे, आखिर वो किसी मजहब के जाये थे??
उनकी बन्दूको से निकलती हर गोली,इस धरती पर कलंक लगा रही थी
आज फिर धरती माँ,शायद दर्द से चिल्ला रही थी
छोटे बच्चो पर भी वो दरिन्दे दया नही दिखा रहे थे
समझ नही आता,आखिर उन बच्चो में कोनसे मजहबी दुश्मन नजर आ रहे थे
आखिर किस मजहब ने उन्हें,इन्सान को मारना सिखाया था?
किस मजहब ने मासूमो पर गोलिया बरसाना बताया था?
खोल कर देखो,हर मजहब की किताब,वो इन्सान की हिफाजत करना ही सीखाएगा
मत जोड़ो उन दरिंदो के साथ किसी मजहब का नाम,मजहब भी बदनाम हो जाएगा
वो किसी मजहब के नही,वो हर मजहब के दुश्मन बनने आये थे
एक इंसानियत का दीप था,वो शायद उसे बुझाने आये थे
लेखक
कपिल गर्ग



Dedicated to
peris hamle me shaheed hue logo ko

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1 More responses

  • poemocean logo
    Anushka (Guest)
    Commented on 17-January-2019

    very nice bhaiya be happy in your god bless you.

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