अब तो

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20 -Sep-2017 Suresh Chandra Sarwahara Life Poem 1 Comments  80 Views
Suresh Chandra Sarwahara

अब तो
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नदियाँ मीठे पानी की
बिखर गईं रेत में।
जंगल में उग आए हैं
बहु मंजिले मकान,
डाल रहे हैं साँसत में
हम जीवों की जान।
खुल गए बाजार अब तो
हरे भरे खेत में।
नदियाँ............।
आँखों का पानी भी तो
अब बचा नहीं शेष,
आदर्शों के ढूँढे से
मिलते ना अवशेष।
स्वार्थ के आलाप अब तो
उठते समवेत में।
नदियाँ..........।
वैभव के सब साधन हैं
अब धनिकों के पास,
निर्धन के जीवन से तो
छीन लिए उल्लास।
जंग छिड़ी रहती अब तो
निर्बल व लठैत में।
नदियाँ............।
चले गए बादल भी तो
चौमासों में रूठ,
पेड़ों के साथ हुए मन
रूखे सूखे ठूँठ।
नहीं बहे पुरवा अब तो
फागुन या चैत में।
नदियाँ...............।
******
- सुरेश चन्द्र "सर्वहारा"




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1 More responses

  • Jyoti
    Jyoti (Registered Member)
    Commented on 20-September-2017

    Nice poem.

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