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अब हम विरवे भी नहीं

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01 -Jul-2017 Vikram Gathania Life Poem 0 Comments  666 Views
अब  हम विरवे भी नहीं

अब हम वे विरवे भी नहीं

थकान हो जाती है
गर्मियाँ हैं
और सफर भी ऊपर से
नौकरियां होती भी कहाँ है घर पर !

पेड़ पौधे भी नहीं हम
कि एक ही जगह खड़े खड़े
प्राप्त करते रहें अपना भोग्य !

अब हम वे विरवे भी नहीं
भिंडी के टमाटर के
जिन्हें पिता पाल रहे हैं
क्यारियों में इन दिनों !

पलने लगेंगे जो खुद ही
आने वाली बरसातों से !

विक्रम गथानिया



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