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आँसू की कुछ बूंदों के ऋण

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13 -Dec-2020 Dr. Archana Tirkey Human Being Poems 0 Comments  586 Views
आँसू की कुछ बूंदों के ऋण

यह सच ही तो है
दिल के उद्गम से
आँखों के विस्तार तक
एक निर्झरिणी प्रवाहित होती रहती
कभी खुशी कभी दर्द में भींगी
अश्रु - नीर से लबालब भरी
परन्तु हैं कुछ इंसान ऐसे भी
जिनके पलकों पर रुक कर
गुम हो जाती है बहती नदी
बूंदें कहीं सूख जाती हैं
उपलब्ध होता अगर ऋण
आँसू की कुछ बूंदों का
काश! ये भी कभी
भावनाएं छलका पाते
क्योंकि विषम परिस्थितियों में
पाषाण समान अटल ख़ड़े
इन चेहरों के पीछे
मोम सा एक दिल भी बसता है
जो जलकर पिघलता और बहता है
संभलकर फिर ठोस बन जाता है।



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