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आशिकों को संभलना (एक ग़ज़ल)

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02 -Feb-2020 Anand kumar (Manish) Social Poems 2 Comments  431 Views
Anand kumar (Manish)

आशिकों को संभलना सिखाते हैं लोग
बेसहारों को चलना सिखाते हैं लोग

ये कलयुग है यहां किसी को किसी की परवाह नहीं
यहां तो अंधों को आईना दिखाते हैं लोग

खुद कहां पहुंचेंगे कोई ठिकाना नहीं
मगर राहगीरों को रास्ता बताते हैं लोग

अगर खुद का मकान जला तो रोते हैं वो
दूसरे का जला तो मुस्कुराते हैं लोग

खुद के चमन पे एक बाल भी नहीं
मगर दूसरों को गंजा बताते है लोग

ये खुद प्रभु का स्मरण करते नहीं
मगर दूसरों को नास्तिक बताते हैं लोग

इनके पास तो कोई प्रतिभा नहीं
मगर प्रतिभागियों को ढोंगी बताते हैं लोग

तू सही राह पे चला है 'आनंद' कभी रुकना नहीं
इसीलिए तो तुम्हें पागल बताते हैं लोग

- ©️ आनंद कुमार 'मनीष'
दुमका झारखंड

आशिकों को संभलना (एक ग़ज़ल)


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2 More responses

  • Anand kumar
    Anand kumar (Registered Member)
    Commented on 08-February-2020

    @Ankita Singh
    Thanks .

  • poemocean logo
    Ankita Singh (Guest)
    Commented on 07-February-2020

    Achhi Kavita hai.

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