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Atmkatha Kursi ki

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15 -Jan-2017 DINESH CHANDRA SHARMA Environment Poems 0 Comments  3,035 Views
DINESH CHANDRA SHARMA

आत्मकथा एक कुर्सी की |
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एक बार जब रात हुई थी , सारी दुनिया सोती थी |
श्यामू ने देखा एक कुर्सी , सिसक सिसक कर रोती थी |
पास पड़ी एक मेज ने पूछा ,”क्यों रोती हो कुर्सी बहिना |
अच्छी खासी अभी तो थीं तुम, कष्ट तुम्हें क्या सच सच कहना |”
कुर्सी बोली,” टेबुल दीदी , आज तुम्हें सच सच बतलाऊं |
याद पुरानी आती मुझको , अपना में सब हाल सुनाऊँ |
शायद तुमको मालूम न हो , पेड़ रही थी पहले में एक |
हरे भरे पत्ते थे मेरे , वन मे खडी थी पहले में एक |
फर फर उडती चिड़िया ,चीं चीं चूं चूं करती थीं |
नीड़ बना करके सारी, मेरी डालों पर रहती थीं |
जीव जंतु पशु और पक्षी , मेरी छाया में बैठते थे |
ठंडी ठंडी हवा में मेरी , धुप तपन से बचते थे |
मेरे पत्ते पीते थे , वायुमंडल की गन्दी हवा |
बदले में वापिस देते थे ,साफ़ सुथरी और ठंडी हवा |
सबकी सेवा करती थी में . सभी प्यार करते थे मुझको |
फिर भी एक दिन बड़े आरों से , काट दिया जाने क्यों मुझको |
कच्ची लकड़ी थी तब मेरी , फिर भी ले गए काट काट कर |
जाने क्या क्या बना दिया, कच्चे अंगों को छांट छांट कर |
इसी दुःख से दुखी में रहती , घुनती रहती हूँ में दिन भर |
कच्चा ही क्यों काटा मुझको , सेवा नहीं कर पायी कहीं पर |”
टप टप आंसू टेबुल रोती ,”यही कहानी मेरी भी है |”
दरवाजा धीरे से बोला , “यही कहानी मेरी भी है |”
फिर तो कागज पेन्सिल खिड़की , चींखे सब यह कह कह कर |
“यही कहानी मेरी भी है, “ कहते सब रह रह कर |
जाग पड़ा श्यामू सोते से , अद्भुत स्वप्न था देखा उसने |
नींद नहीं आयी फिर उसको , लेटे लेटे सोचा उसने |
“क्या हो गया आज मानव को , क्यों पेड़ों को काट रहा है |
अपना हित करने वालों के , हित को ही क्यों चाट रहा है ||
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