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बस अब कोरोना

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12 -Apr-2021 PURNIMA KUMARI Sad Poems 0 Comments  136 Views
बस अब कोरोना

एक अरसों- से आरजू थी।
फुर्सत के दिन की,
शायद मुकम्मल भी हुई मेरी फरियाद,
वजह थी सिर्फ और सिर्फ कोरोना।
कभी-कभी लगता है मुझको,
मैं पिंजरे में कैद हूं,
शायद आज मुझे एहसास हुआ,
क्या होती है आजादी।
ना होगी कभी तमन्ना फुर्सत के दिन की
बस अब कोरोना।
महामारी का ऐसा रूप,
मैं देख ना पाऊंगी।
अपने अपनों से दूर,
मैं सह ना पाऊंगी।
बस अब कोरोना।
कब तक डर डर कर यूं जियूंगी मैं।
कब तक मास्क लगाऊंगी।
कब तक 10- 10 मिनट में हैंडवाश करूंगी मैं।
अब तो मैं थक चुकी हूं।
बस अब कोरोना।
जिंदगी मानो रुक सी गई।
कभी-कभी लगता है मुझको,
कितने दिन ऐसे रह पाऊंगी।
मानो पल पल सांसे गिन रही हूं जैसे,
बस अब कोरोना।
कितनी हसी है यह दुनिया,
अभी तक तो देखी भी नहीं हूं,
बस कर रही हूं इंतजार तेरा लौट जाने की,
बस अब कोरोना।
पूर्णिमा गुप्ता



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