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बेजुबाँँ (एक दास्ता एहसास की)

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14 -May-2019 Bijendra Aehsas Love Poem 0 Comments  155 Views
Bijendra Aehsas

बेजुबाँँ (एक दास्ता एहसास की)
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एक दोस्त थी,
जो बोलती तो थी
मगर वे बेजुबां थी।
एक मैं था जो बोलता था
मगर बेजुबां था।
हम दोनो,
बहुत सारे बातें किया करते थे
फेसबुक व्हाट्सएप ट्वीटर,
किसी से नही डरते थे।
उसकी खुशी मे
हम शामिल हो खुशियाँ मनाते,
और वे हमारी जीत पर
तालियां बजाती
वे हमारे दुख पर रोती
तो कभी रातोंरात
हम भी न सोते।
मगर ऐसे बर्षों बीत गये
कभी इकरार नहीं किये
कभी प्यार का इजहार नही किये।
उसको लगता था
पहले वे बोलेगा
अपना दिल के सारे
राज खोलेगा।
मुझको लगता था कहीं टूट
न जाये दोस्ती के धांगे
इसलिए कभी हांथ न बढ़ाये आगे।
आंखों का प्यास मुझे पढ़ने नहीं आया
उसे कलम का दर्द समझने नही आया
आखिर एक दिन मेरे घर
एक कोरियर आया,
कोरियर के अंदर एक डायरी पाया।
जिसमें लिखा था तु कैसा एहसास
तुझे एहसास न हो पाया,
मेरे प्यार का दिल मे
तेरा प्रकाश हो न पाया।
मैं तो तुझ बिन
चल दी ये जमीं छोड़ कर
न ढुढ़ना अब तू मुझे मुड़ कर...
समझ आता नही कुछ सुझाता नहीं
मैं अब बे-वाँक. बेजुबां उसको कैसे जबाब दूं।
जिय के या मर के उस पगली को कैसे हिसाब दूं।
युवा कवि- विजेन्द्र एहसास
(बागी बलिया, उ0प्र0)
मोबा.: +९१- ९२०५१४३३२४



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