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बिना मात्रा की कविता / Bina Maatra Ki Kavita

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20 -Mar-2019 mannu bhai Dream Poems 0 Comments  1,586 Views
mannu bhai

बहुत सुन्दर सर


मैने भी प्रयास किया बिना मात्रा की कविता का


*बिना मात्रा की कविता*

नर ह रह नर बन कर, थन रख हरदम तन कर।
मन पर वजन कम कर, पर दरद पर नयन नम कर।
हर तरफ ह नफरत जहर,जमघट सम ह यह शहर।
रण पर बरस जम कर, न पद रख पथ पर थम कर।
वश रख बस तन नस पर, न रख बस जन दस पर।
सर न रख पर चरण पर, रख गरल वहन सरण पर।
तरण वरण पर सयन कर, पर सत्य पथ चयन कर।
गलत नजर अब मत कर,हर बहन सह इज्जत कर।
उदर भरण स्वयं श्रम कर, व्यर्थ हृदय न भ्रम कर।
कर्ण रख सकल जग पर,पर नमन कर स्वयं रग पर।
सफल ह अब बस वह नर, इज्जत ह जब हर घर।
कम्पन न रख थर थर, जगत् नद अब स्वयं तर।

मनोज कुमार पुरोहित,अलीपुरद्वार (पश्चिम बंगाल)



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