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चश्मा ।

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26 -Apr-2022 Harpreet Ambalvee Life Poem 0 Comments  267 Views
Harpreet Ambalvee

सोचता हूं आज अपना चश्मा बनवा ही लू ,
बस थोड़ा छोटे-मोटे काम निपटा कर आता हूं,
फिर मै अपना चश्मा बनवाता हूं,

मुन्ने की बड़ी क्लास का खर्चा है,
गुड़िया की एडमिशन का भरना परचा है,
सारी किताबें, वर्दियां सब लेकर आता हूं
मैं फिर अपना चश्मा बनाता हूं,

अभी राशन की लिस्ट भी देनी है,
भागवान ने इस बार सौदे लिखने में कभी देरी है,
लिस्ट में तो इस बार सब कुछ आधा है,
फिर पता नहीं क्यों बिल बन रहा ज्यादा है,
शायद तेल की और चीज़ो के दामों में हुआ इजाफा है,
चलो पहले इससे लिस्ट को लाला जी को थमा कर आता हूं,
मैं फिर आकर अपना चश्मा बनाता हूं,

पैट्रोल 106 के पार हो गया है,
बाइक पर जाना भी अब दुश्वार हो गया है,
सोचता हूं कि पुरानी साइकिल निकाल ही लू,
उसको थोड़ा ठीक करवा के चमका कर आता हूं,
मैं फिर अपना आकर चश्मा बनाता हूं,

आजकल गर्मी बहुत हो गई है,
पसीने से लथपथ कमीज़ हो गई है,
नींबू पानी (शिकंजवी) पी भी लेता मगर,
यह भी 30 के पार की हुआ है,
सामने शीतल जल से अपनी प्यास बुझाता हूं,
मैं अपना चश्मा फिर लेकर आता हूं,

आंखों से अब थोड़ा कम ही दिखता है,
डॉक्टर कहता है चश्मा लगवा लो,
नहीं तो आंखों को खतरा है,
डॉक्टर की फीस, टेस्टस इतने सारे है,
पहले उसका भुगतान करके आता हूं,
मैं फिर अपना चश्मा बनवाता हूं,

मध्यम वर्गीय का यही हाल है,
बेरोजगारी, निम्न शिक्षा स्तर, मंगाई से बेहाल है,
लेकिन मीडिया सिर्फ चिललाता रहता,
हिंदू-मुस्लिम मे से कौन गुनाहगार है,
नेता निश्चिंत, प्रधान सेवक बेफिक्र है,
किसी नेता का या तो परिवार नहीं,
या उनके बच्चे विदेशों मे कहीं है,
मध्य वर्ग महगाई, टैक्स की चक्की मे हर रोज़ पिसता जाता,

देखो अम्बालवी आम आदमी अपना चश्मा कब बनवाता है।

चश्मा ।


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