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Dadi

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16 -Jul-2016 प्रदीप Grandparents Poems 2 Comments  8,265 Views
प्रदीप

न खिडकी और दरवाजा न रोशनदान कहते है।
घर के इन बडे बूढो को घर की शान कहते है।
न समझे इनकी मजबूरी और इनको जोभी आँसू दे
उसे इंसान की बस शक्ल मे शैतान कहते है।
मयस्सर है जिन्हे भी इन पुराने पेडो़ की छाया
उन्हीं सबको तो किस्मत का बडा़ धनवान कहते है।
ये कोहीनूर हमको जो मिले है वक्त से लेकिन
इन्हें तो हम महज़ इक काँच का सामान कहते है।
इन्हीं अनमोल हीरों की कदर जिनको नही होती
उन्हीं को नासमझ कहते है या नादान कहते है।



Dedicated to
My grandmaa

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2 More responses

  • poemocean logo
    Kartik (Guest)
    Commented on 07-October-2016

    awesome.

  • dhiraj Kumar
    Dhiraj Kumar (Registered Member)
    Commented on 18-July-2016

    Good poem..
    We should respect our old people..

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