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दर्द की वो चीखे ….

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05 -Oct-2017 Saroj Peace Poems 0 Comments  1,143 Views
Saroj

दर्द की वो चीखे ….

तड़प तड़प तड़प कर उसकी आखिरी साँसे ,
लडख़ड़ाती हुई आवाज में माँ का नाम लिया होगा ,
वो मनहूस दिन, वो मनहूस घडी ,
वो मनहूस सा किसी इंसान के रूप में हैवान होने का एहसास ,
एक मासुम सी हसी जो होने वाली थी थोड़ी देर में ही गुम,
किसे पता था वो तोतली बोली ,
मासूम सी मुस्कान कही खो जायेगी ,
क्या पता था उसकी माँ को आज का दिन है आखिरी उसके साथ ,
कैसे कुछ पलो में जिंदगी बर्बाद हो गई ,
जो सुबह खिलखिलाती हसी को विदा किया था ,
क्युकी उसको उसके सपनो तक पहुंचना था ,
वो हसी कही गुमनाम हो गई ,
कोसिस वो किया होगा आखिरी सांस तक खुद को बचाने की,
न जाने वो उस पल कितने दर्द से गुजरा होगा ,
जिंदगी तो चली गई पर उसकी यादे रह गई ,
और छोड़ गया अपने मोत के साथ वो हजारो सवाल ,
क्या कभी उसका जवाब मिल पायेगा ..?
क्या प्रशासन , क्या स्कूल , क्या सरकार,
कोई है जो एक “माँ” को उसका बच्चा लोटा पायेगा …?
क्या होता है दर्द अपने कलेजे के टुकड़े को खोना का ,
क्या वो “हत्यारा ” समझ पायेगा …..?
गुजर रही होगी उस अनाथ माँ की राते और दिन रो रो कर ,
जो कभी खुद सोती थी लाडले को सुला कर ,
जिसने नो महीना पला था अपनी कोख में ,
क्या भुला पाएगी ये हादसा रातो में ,
रह रह कर याद आएगी लिखे उसके आखिरी खत ,
और उसकी प्यारी सी बाते …
जो कह गया न जाने कितनी ही अनकही बाते …
जो इतनी छोटी उम्र में भी बता गया ,
“माँ” तेरी डाट में भी मुझे प्यार नजर आता है ,
“माँ ” तुम कितना मेरे लिए परेशान होती हो ,
“माँ ” तुम कितना काम करती हो ,
“माँ ” तुम कभी क्यों नहीं थकती हो ,
पर अब इन बातो का क्या ….
ये तो बस पन्नो में कही गुम हो जायेगी ,
जैसे “प्रद्युमन” की “चीख ” दीवारों में कही “गुम ” हो कर रह गई ,
जैसे उस इंसान के मुखोटे से इंसानियत कही “गुमनाम” हो गई है …



Dedicated to
प्रद्युमन

Dedication Summary
प्रद्युमन who got killed in Gurugram school.
I want to dedicate him because i want justice for him.

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