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डर लगता है

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15 -May-2019 Ritika Pandey Social Issues Poems 0 Comments  57 Views
डर लगता है

अब मुझे भी डर लगता है,
अब मुझे भी घुटन होती है,
अब मुझे भी चुभन होती है,
अब मुझे भी जलन होती है,

कैसे वो रोज़ दुपट्टा बाँध कर खुद को मेहफ़ूज़ समझती है,
महज़ नज़रे झुका कर जाने को वो अपनी जीत समझती है,
अनजान क़दमों की आहट सुनते ही अपनी गति बढ़ा कर वो खुद को खुशनसीब समझती है,

कब तक वो उस गली से न जाने के बहाने करेगी,
कब तक यूँ घुट घुट कर जियेगी,
उसने आज अगर कुछ किया नहीं तो,
उसकी संतान के साथ भी तकदीर यही करेगी |

वो कब समझेगी की दुपट्टा नहीं उसे हिम्मत बाँधनी है,
उसे नज़रें नहीं उन शैतानों को झुकाना है,
उसे अनजान आहटों से नहीं घबराना है,
इस बार उसे उन्हें हराना है |



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