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धतूरा

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01 -Mar-2021 Suresh Chandra Sarwahara Nature Poem 0 Comments  338 Views
Suresh Chandra Sarwahara

धतूरा
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पथरीली
ऊबड़ खाबड़
उजड़ी भूमि के ऊपर
कूड़ों के ढेरों
झाड़ -झंखाड़ों
मिट्टी के ढूहों पर तनकर
पनप रहे धतूरे !
लगता है
तुम हो
रमते जोगी
भस्म रमाये
औघड़दानी
भोले शंकर के
अनुयायी पूरे ।
सर्दी गर्मी
बरसातों के
मौसम को
हँस हँस कर सहते ,
कद्र न करते
लोग तुम्हारी
तिरस्कार में
कुछ भी
रहते हैं कहते ।
कवियों ने तो
कनक नाम की
सोने से ही
कर दी तुलना,
नहीं प्रभावित
कर पाई पर
तुम्हें जगत की
कोई छलना ।
जो भी जग में
अशुभ हेय है
शंकर उनको
बड़े प्रेम से
गले लगाते,
युग युग से
तुम रहे उपेक्षित
इसीलिए तो
उस नीलकण्ठ को
तुम हो भाते ।
उस भोले सम
दुःख के काँटों से
रही तुम्हारी
कब है दूरी,
ऐसे कष्ट - सहिष्णु
तुम बिन
आशुतोष की
पूजा रहती
सदा अधूरी ।
अरे धतूरे !
यह जग तो
तुमको खाए बिन
वैसे ही
मद से बौराया,
विषम दशा में
तेरा खिलना
लोगों को है
कहाँ सुहाया ।
जब जब होती
आवश्यकता
लोग तुम्हें तब
ढूँढ ढूँढ कर
भक्तिभाव से
आदर देते,
काम साध फिर
डाल कहीं
कूड़ेदानी में
भूले से भी
नाम न लेते ।
लेकिन
इन सब बातों का
तुम पर फर्क
कहाँ है पड़ना ,
संस्कृतियों संग
सदियों से
तुमने तो
सीखा है बढ़ना ।
बता धतूरे !
बंजर धरती के
सूने कोनों में
निस्पृह होकर
कैसे तू जीता,
क्या तूने
जीवन के
अँधियारों में
मन का दीप जला
पढ़ ली है
पूरी गीता ।
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- सुरेश चन्द्र ' सर्वहारा '



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