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दिल एक घर

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11 -Mar-2016 Anwar Culture Poems 0 Comments  1,555 Views
दिल एक घर

हर दिल मेँ एक घर हो और हर घर मेँ एक दिल,
और इन मेँ लोगोँ के रहने का सामान होना चाहिये.

हमने जो कदम उठाए हैँ तो फिर कैसे लौट जायेँ?
आखिर तो हर एक का कोई, ईमान होना चाहिये.

वो बाम तक तो आया था, मुझको ढूँडता हुआ ,
पर मुझे रोकने का कोई तो पैगाम होना चाहिये.

हर कोई जानता है कि मेरी उससे तकरार क्योँ हुई.
पर उसको भी तो जरा इसका, एहतराम होना चहिये.

कुछ वायदे किये हैँ और कुछ तसल्लियाँ मिलीँ
पर इससे आगे भी तो कुछ काम होने चाहिये.



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