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Maati Ki Gudiya

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12 -Jan-2015 anuj bhargava Doll Poem 0 Comments  2,325 Views
anuj bhargava

माटी की गुड़िया

मैं कैसे भूल जाऊं
वो  बचपन की यादें
यादें तो याद रहती हैं
कहीं न कहीं दिलों मैं घुमती हैं
उन यादों को आज भी भुला नहीं पाती
ना ही भूलना चाहती
वो मुझे मां का पुकारना
और मेरा मां से छुप छुप कर
घर से बहार जाना
अपनी सहेलियों को इकठ्ठा कर
धूल मिट्टी में मस्ती से खेलना
गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू में
उसी माटी से घरघर खेल कर
छोटी सी गुड़िया बनाना
जैसे मां प्यारी लगती थी
और कितनी सुंदर भी
हर वक्त उसका चेहरा
आँखों में ही रहता था
उस माटी की जब गुड़िया बनती
लगता मां जैसी दिखती
घर जा कर मैं मां को दिखाती
देखो मां गुड़िया का चेहरातुम्हारे जैसा लगता है  ना
मां भी हाँ मे हाँ मिलाती
रूप मेरा नहीं तेरा है बेटी
तू मेरी माटी की गुड़िया
मां की इस बात से मैं गुस्सा हो जाती थी
मुझे तो बस उसमे मां ही नज़र आती थी
फिर बहार जा कर बार बार गुड़िया बनाती थी
हमेशा उन गुड़ियों मे मां का चेहरा पाती थी
सूख जाने पर खूब उनको सजाती थी
मां कभी कभी कपड़े सिल कर पहनाती
अब मैं खुद बड़ी हो गई
मेरे आँगन में मेरी अपनी
एक गुड़िया हो गई
घरों के बहार अब मिट्टी नहीं होती
माटी की गुड़िया कहीं लिप्त हो गई
बाजारों मैं बनी बनाई गुड़ियों की
भरमार हो गई
आज इन्हीं गुड़ियों को देख
यादें फिर ताज़ा हो गईं
कहाँ वो माटी की गुड़िया
जिन्हें मैं मां को दिखाकर
खुश होती थी
उन्हीं ख़ुशी की यादों में
अपनी गुड़िया को सीने से लगा
उन पलों मे डूब गई
हाँ माटी की गुड़िया
अब रंगीन गुड़ियों में
परिवर्तित हो गई
मेरी माटी की गुड़िया



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