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दोपहर

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31 -May-2020 Anand kumar (Manish) Nature Poem 0 Comments  104 Views
Anand kumar (Manish)

दोपहर की बेला में
हम सब गए आम गाछ के नीचे
किसी ने चद्दर तान लिया
तो कोई खटिया खींचे

गाछ के नीचे लगा बिछौना
सब बुद्धि जीवी लेट गए
जिसको-जिसको जगह न मिली
वो गाछ के नीचे ही बैठ गए

इस आस में बैठे थे कि
कोई अपना बिस्तर छोड़ेगा
लगे खराटे भरने मानव
खुद की निद्रा काहे तोड़ेग

बिस्तर वाले को खर्राटे लेते-लेते
संध्या बेला हो गयी
गाछ के नीचे बैठे मानव
वहीं बैठे-बैठे सो गए

जब बिस्तर वाले मानव जागे
तब वो भोचक्का हो गए
गाछ के नीचे बैठे मानव
बिन बिस्तर के कैसे सो गए

बड़े प्रेम से उन्होंने
नीचे बैठे मानवो को जगाया
उन्होने अपने बिस्तर में
उन मानवो को सुलाया

करवट बदलते रह गया बिस्तर में
लेकिन उन्हें निंद्रा न आयी
उन्होंने कहा बिस्तर से अच्छा है
आम गाछ की ठंडी छाया

तब उन मानव को
ऊपर वाले की लीला समझ में आयी
जो जिस जगह है,उसे ऊपर वाले
ने उसी जगह के लिए बनाया

दूसरे दिन लोगों ने
न चद्दर ताना न खटिया बिछाया
बैठ गए ऐसे ही गाछ के नीचे
लेने वृक्ष की ठंडी छाया

-©️ आनंद कुमार (मनीष)
दुमका झारखंड (814101)

दोपहर


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