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MAN KA ARMAAN

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11 -Sep-2015 Kamal Sartaaj Dream Poems 0 Comments  1,716 Views
MAN KA ARMAAN

सागर की गहराई से ढुंढकर लाया था जिसे,
एक छोटी-सी धारा में वो चिराग बह गया।।
जाने क्यूँ जगा मेरे मन का अरमान,
या मन भी मेरे दिल की कह गया।।
कुछ पाया भी या नहीं मैंने,
या सब कुछ खोता ही रह गया।।
ओह! अफसाना एक याद आया था मुझे,
जब सोचने लगा तो वो भी अलविदा कह गया।।
कहाँ गया था उस दिन का सुरज,
चाँद भी उस रात का कहाँ बह गया।।
शायद समा मजबुर है बारिश के लिए,
जिसमें मेरे दिल का अरमान बह गया।।
आहें इस दिल की खैर मालूम किसे,
गरिब-सा ये दिल बस रोता रह गया।।
हमें मालूम न था राज-ऐ-दिल,
हवा का झोंका-सा वो सबकुछ कह गया।।
दौलत इस दुनिया की है जिस्मों का सौदा,
दिलों का सौदा यहाँ अधूरा रह गया।।
दिदार होगा उस सुरज का अब अगले ही पल,
ये सपना मेरा सपना ही रह गया।।



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