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एक दीया हुँ मैं...।

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05 -Nov-2018 Sandeep Wadekar Diwali Poem 0 Comments  85 Views
एक दीया हुँ मैं...।

एक दीया हुँ मैं...।

स्वयं अंधेरे में रहकर,
अंधकार दूर करता हुँ मैं,
जलता ही रहता हुँ,
क्योंकि एक दीया हुँ मैं।

कभी सिर्फ मिट्टी का होता था,
अब धातु का भी होता हुँ,
मुझे इस बाहरी काया से क्या करना है,
मेरा कार्य तो जग में उजाला करना है।

मुझसे प्रज्ज्वलित अग्नि,
पंचतत्वों में से एक है,
जो धार्मिक और सामाजिक कार्य में,
करती सभी को एक है।

कभी सिर्फ प्रकाश देने के लिए था मैं,
और गरीबो के घर अकेला पाया जाता था,
लेकिन अब सजावट का सामान भी बन गया हुँ,
और अमीरों के घर पंक्तियों में सजाया जाता हुँ।

अमीरों की पंक्तियाँ रूपी दीपमाला में भी, मैं खुश हुँ,
और गरीब के पास अकेले भी, मैं उतना ही खुश हुँ,
क्योंकि, दीया हुँ मैं...सभी को प्रकाश रूपी खुशी देकर,
खुश हुँ मैं...एक दीया हुँ मैं।

मेरे ज़िन्दगी के सफर में, सिर्फ अकेला मैं नही,
घी रूपी 'समय' और बाती रूपी 'कर्म' भी है,
मेरा सफर, समय के साथ समाप्त हो जाएगा,
लेकिन मेरे कर्म, नए ज़िन्दगी को आगे बढ़ाएंगे।

डर लगता है यह सोचकर भी कि,
मेरे कारण किसी को तपिश न लगी हो,
बस यही सोचकर क्षमा कर दीजियेगा कि,
आपको जो एक पल लगा, वही मुझे ज़िन्दगी भर।

मेरी ज़िंदगी सिर्फ मेरी नही है,
यह आप सभी से समान रूप से जुड़ी है,
जब मैं जलूँगा, तब आप खुश रहेंगे,
जब आप खुश रहेंगे, तब मैं जलूँगा।

मेरे जलने से..घर सुंदर होता है,
मेरे जलने से...सभी का कल्याण होता है,
मेरे जलने से...सभी को आरोग्य प्राप्त होता है,
मेरे जलने से...घर मे धन का वास होता है
मेरे जलने से...शत्रु का विनाश होता है,
मेरे जलने से...तन और मन शांत होता है,

तो क्यों न जलु मैं...
मैं जलूँगा...हमेशा जलूँगा,
जब तक मेरा समय है, तब तक जलूँगा,
और छोड़ जाऊँगा, अधूरी बाती को,
फिर से जलने के लिए...।

- संदीप वाडेकर



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