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एक लड़की सुलझती, उलझती सी

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19 -Mar-2022 Megha Raghuwanshi Daughter Poems 0 Comments  157 Views
एक लड़की सुलझती, उलझती सी

एक लड़की सुलझती, उलझती सी
खुद को थामे रही अंजानी राहों से
दूसरो का सम्मान करती
खुद को भी ध्यान में रखती एक लड़की
दुनियाभर की परेशानियों में भी
खुलकर हसती, खिलखिलाती एक लड़की
दुनिया की चकाचौंध में रहकर भी
खुद को ढूंढती एक लड़की
लाख आफतो के बाद भी
सपनो को कसकर थामे एक लड़की
चेतन भगत की किताबे पढ़कर भी
अध्यात्म की ओर जाती एक लड़की
दुनियाभर के समझदारों की बात सुनकर भी
खुदके विचार बनाती एक लड़की
हमेशा सही भी नहीं कह सकते
गलती होने पर गलती मानती एक लड़की
देखकर इस मतलबी दुनिया को
फिर भी अभी तक मासूम हैं एक लड़की
भीड़ में कईयों से मिलकर भी
खुद से मिलकर खुश होती एक लड़की
तर्कसंगत होकर भी भावुक होती
भावनाओं पर खुलकर बोलती एक लड़की
खुलकर अपने विचार रखकर भी
संस्कारों में बंधी एक लड़की
तर्कसंगत होकर भी
दूसरो को रोता देख रोने वाली एक लड़की
हां मैं ही हूं वो लड़की। मेघा रघुवंशी



Dedicated to
Megha raghuwanshi

Dedication Summary
Poem is about myself

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