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एक प्रेम कहानी ऐसी भी

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18 -Apr-2018 Akshunya Nature Poem 0 Comments  661 Views
Akshunya

दूर हिम के आंचल को ओढ़े हुए पहाड़ों के बीच,
सिंधुरी उजाले ने दी जब दस्तक,
मानो सफेद आंचल को संभाले एक युवती,
बिंदिया सजा रही हो अपने ललाट पर।

विहग अपने आशियाने से निकले दूर गगन में,
जैसे केश लहरा दिए हों उसने यूँ ही मस्ती में,
कोयल की कूहुक आने लगी जब अमुआ की डाली से,
वो मंदिर में कर रही थी उस ईश्वर से मनुहार अपनी मधुर वाणी में।

नव कोंपल पेड़ों की मन लुभाने लगी,
ऐसा लगा मानो वह श्रृंगार कर प्रियतम को रिझाने लगी,
जब उसने अपने गेसूओं में गजरा लगाया,
मानो चमन का हर एक फूल खिलखिलाया और उसने चमन को महकाया।

कजरा सजा कर जब उसने पलकें झपकाईं,
ऐसा लगा मानो गहरे बादलों में दामिनी कड़कड़ाई,
पल में ऐसे वो रूप बदले,
देखने वाला स्तब्ध हो जाए कुछ न बोले
लो हो गई वो कुपित,जब दोपहरी छाने लगी,
सूर्य की गर्मी से जब धरती कुमहलाने लगी।

लो हो गई शाम तारे टिमटिमाने लगे,
यूँ लगा मानो ढेरों सितारे उसका आंचल छोड़ आसमान पर छाने लगे,
सरसराती हवा यूँ बहने लगी,
जैसे होले से अपने पिया के कानों में कुछ कहने लगी,
नीलगिरी के वृक्ष यूँ आलिंगन बध होने लगे,
जैसे वो अपनी पिया में खोने लगे।

यह प्रकृति की प्रेम कहानी है,
यह देखी है हमने बहुत,
फिर भी हमसे अनजानी है।।



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