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फिक्र ये कैसा ………?

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19 -Nov-2017 Saroj Life Poem 0 Comments  1,179 Views
Saroj

फिक्र ये कैसा ………?


परेसान सी आजकल मै रहती हु ,
पर किसी से नही कुछ कहती हु,
पाना है बहुत कुछ ,
कुछ हासिल अभी तक हुआ नही ,
इसलिये मै दर दर भटकती हु ।

ख्वाहिशे तो बहुत है मेरे ,
उनके आदते भी नेक है ,
वो हर पल उड़ाने भरने को सोचती है ,
आसमां को छूना चाहती है ,
इसलिये मै क्षितीज तक जाती हु ।

न जाने क्यों अधूरापन है जिंदगी में ,
उन हसी सपनो का हर पल से ,
वो हमेसा ख़ामोशी में जिया करती है ,
पर मै उनको जवा बनाना चाहती हु ,
इसलिये आजकल मै मैहफिल को जाती हु ।

यु तो खबर नही रखती मै खुद की भी ,
पर दुनिया की भीड़ में भी ,
गुम हुए चाहतो को पैहचानती हु ,
मै देना चाहती एक मुकाम उनको ,
इसलिए मै आजकल रातो से बात करती हु ।

हाँ मै कुछ खोई – खोई सी ,
कुछ चुप सी , कुछ अधूरी सी ,
कुछ परेसान सी रहती हु ,
क्योंकि मै अपनी नही ,
अपने उन अरमानो की फ़िक्र करती हु ।



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