Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

राह देखी थी कब से नवोदय वापस जाने की

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29 -Nov-2019 PANKAJ CHOUREY Friendship Poems 0 Comments  35 Views
राह देखी थी कब से नवोदय वापस जाने की

Raah dekhi thi is din ki kabse, Aage ke sapne saja rakhe the naajane kab se. Bade utavle the yahaan se jaane ko , Zindagi ka agla padaav paane ko . Par naa jane kyon …Dil mein aaj kuch aur aata hai, Waqt ko rokne ka jee chahta hai. Jin baton ko lekar rote the Aaj un par hansi aati hai , Na jaane kyon aaj un palon ki yaad bahut aati hai . Kaha karte the …Badi mushkil se 7 saal seh gaya, Par aaj kyon lagta hai ki kuch peeche reh gaya. Na bhoolne wali kuch yaadein reh gayi, Yaadien jo ab jeene ka sahara ban gayi. Meri taang ab kaun kheencha ka

काश हम एक नवोदयन होते।।

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11 -Nov-2019 PANKAJ CHOUREY Friendship Poems 0 Comments  122 Views
काश हम एक नवोदयन होते।।

काश हम एक नवोदयन होते।। काश हम एक नवोदयन होते।। हमारी भी पी.टी जाने के रूटीन होती पी.टी के बाद सो जाना हमारी भी आदत होती काश हम एक नवोदयन होते।। दोस्तों के साथ sick,OD होने के बहाने होते क्लास न जाने पर भी दोस्तों से अटे

वो नवोदय के दिन आज याद आते है !!!

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06 -Nov-2019 PANKAJ CHOUREY Friendship Poems 0 Comments  191 Views
वो नवोदय के दिन आज याद आते है !!!

वो कमीज के बटन ऊपर नीचे लगाना अपने बाल खुद न काढ पाना पी टी शूज को चाक से चमकाना वो काले जूतों को पैंट से पोछते जाना ऐ मेरे नवोदय मुझे जरा फिर से तो बुलाना … वो बड़े नाखुनो को दांतों से चबाना और लेट आने पे मैदान का चक्

हसींन पल जुदा हुए ( नवोदय की याद में )

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03 -Nov-2019 PANKAJ CHOUREY Friendship Poems 0 Comments  88 Views
हसींन पल जुदा हुए ( नवोदय की याद में )

जब चमन उजर गया मेरे जहाँ से तब कुछ नज़र नही आया मुझे वहां पे -1 याद आती रही मुझे उस बिछड़े चमन की वहाँ के रेवाज़ और तहजीबो तमद्दुन की -2 कितना खुशगवार था वो आशियाना दोस्तों के साथ मिलकर नहाना -3 होली के दिनों में कुछ दोस्त

मेरा नवोदय मेरा परिवार

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03 -Nov-2019 PANKAJ CHOUREY Friendship Poems 0 Comments  55 Views
मेरा नवोदय मेरा परिवार

वो दिन मैं कैसे भूलूं? जिस दिन तुझको पाया था। यूं तो थे हम अंजान मगर, तूने ही अपनाया था। वो दिन बीते महीने बीते, सालों को भी बीत जाना था। जो साथ था हमारा अटूट प्रिये, वो एक दिन तो छूट ही जाना था । रोया था बिछड़ के तुझसे,

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