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Julm Beinteha

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18 -Sep-2015 Raj Bhandari Friendship Poems 0 Comments  1,763 Views
Julm Beinteha

जुल्म बेइन्तहां

जो बंद रखू ये जुबान तो घुटे है दम मेरा ,
जो बोलूं तो कलेजा अपना बाहर आता है,
हंस रहा है दूर खड़ा हो कर के , मुल्ज़िम ,
मेरी बेबसी पे अब देखो कैसे मुस्कुराता है,

और कोई क्यों सुनेगा यंहा मेरी ये फरयाद,
बड़े लोगो को तो ज़माना सारा सर झुकाता है
महज इक खेल है दिल का लगाना उनका राज ,
तेरे जाने से, अब यंहा, किसी का, क्या जाता है,

जाने क्या वो बात है तेरी इस अदायगी में राज,
कुछ तो सच, तेरे हर बयां में, सबको नज़र आता है,
पर, कुछ होना नहीं, कि उठ चुका है, तेरा दाना पानी ,
उनके चेहरे की इबारत पे, साफ ये लिखा नज़र आता है,

पर खूब दाद है ज़ज़्बे को और अब सलाम है इस होंसले को,
कि बेइंतिहा सह के जुल्म भी तू ,अब तक, राज मुस्कुराता है !!



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