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हक

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21 -Jul-2020 abhilekh shayar Love Poem 0 Comments  146 Views
हक

यूं तो बहुत पसंद है मुझे उसकी बड़ी आंखें,
उन आंखों में सपने देखू ये हक नहीं मुझे,

उसके गुलाबी गाल और पंखुड़ी से उसके होंठ,
भंवरा बन रस चुराऊं ये हक नहीं मुझे,

कि उसके खुले बाल जैसे काली घटा हो,
उस घटा की छांव में सो जाऊं,
ये हक नहीं मुझे,

बड़ा बेबस हूँ आजकल में,
उसकी बातें करता हूं,
उसे ही दिल में रखता हूं,
उसकी बातों पर हंसता हूं,
उसी की मिन्नतें करता हूं..
फिर भी उसे अपना कहूँ मैं,
ये हक नहीं मुझे...

ऐसा नहीं कि प्यार मेरा एक तरफा था,
कल ही की बात है सब अच्छा था.

आज फिर समाज ने
लैला-मजनू के नाम जुदाई कर दी,
सुना है उसके ना चाहते हुए भी,
उसकी सगाई कर दी,

यूं तो लाखों सपने हमने देखे थे साथ-साथ,
अब तो सपने में भी देखूं ये भी हक नहीं मुझे..

- Abhilekh singh allahabadi



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