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हक़ है तुम्हें

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हक़ है तुम्हें / Haq Hai TumheThis is a very energetic and motivational poem for a young married girl whose husband has been expired due to some unavoidable circumstances. This poem encourage the widow to start a new life. The poet say that such women have also rights to enjoy their life. They have rights to fill their life with different colours.

17 -Apr-2020 Divya Raj kumar Motivational Poems 0 Comments  429 Views
Divya Raj kumar

ये जो सफेद लीबास
जो तुमने पहना है
मेरी मैयत के बाद जो
ये बन चुका तुम्हारा गहना है
उतारो इसे तुम
ज़रा देखो
अपने मन के बागीचे में
वहाँ आज भी रंग बिरंगे फूल खिले हैं
उन फूलों से रंग चुराओ तुम
फिर अपने कपड़ों पर चढाओ तुम
ये सुर्ख लाल चादर
अपनी आंखो से हटाओ तुम
देखो काजल सुरमा यूं उदास बैठा है
इन्हे फिर से सजाओ तुम
इन सिकंज की लकीरों को
अपने माथे से उतारो तुम
तुम्हारी बिंदी तुम्हे पुकार रही
इन्हे माथे पर लगाओ तुम
ये जो लब अब चुप से रहते है
वो मुस्कान जो कहीं खो गई है
उसे फिर होंठों पर लाओ तुम
मेरे लिए मुस्कुराओ तुम
तुम्हारे हाथों का चुड़ा जो टूटा है
ये जो तुम्हारी सूनी कलाईयां है
देखो कंगन तुम्हारे इंतज़ार में बैठा है
इन्हे अपनी कलाईयों पर बिठाओ तुम
मेरे कान कब से तरस रहे
तुम्हारी पायल की सरगम सुनने को
आओ पैरों से घुंघरू बजाओ तुम
मुझे मेरा सुकून लौटाओ तुम
तुम्हारी ज़िन्दगी की रफ्तार
जो मेरे जाने से थम सी गई है
ये जो अपनी ज़िन्दगी की सुइयां
तुमने रोक रखी है
बदलते वक़्त को अपनाओ तुम
अपने सफ़र में कदम बढ़ाओ तुम
हक़ है तुम्हें आज भी
अपनी हसरतों में जीने का
अपनी बेकस ज़िन्दगी में
एहसास-ए-मसर्रत भरने का
तुम वो खुश्बू हो
जो इत्र से परे है
आओ अपनी खुश्बू फैलाओ तुम
चलो खुद को महकाओ तुम
हाँ हक़ है तुम्हें आज भी
अपनी बेरंगीन दुनिया में
नए रंग भरने का
अपनी शर्तों पर जीते जाओ तुम
चलो फिर कदम बढाओ तुम
-दिव्या राज कुमार



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