Latest poems on indian republic days, 26 january, gantantra diwas, swadhinta diwas

हरियाणा की छोरी (कल्पना चावला )

1
03 -Feb-2018 DINESH CHANDRA SHARMA Science Poems 1 Comments  661 Views
DINESH CHANDRA SHARMA

हरियाणा की छोरी थी वो, जन्मी थी करनाल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||

बचपन से ही आसमान की और , निहारा करती थी |
क्या कैसे होता है नभ में, रोज बिचारा करती थी |
प्रातः काल किरणों के रथ पर , सूरज दादा आते है |
पूर्व से पश्चिम तक जाते , विविध खेल दिखलाते है |
रंग बदलते रहते दिनभर , राज छिपा क्या चाल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||

संध्या होते ही जब जग में , अन्धकार छा जाता है |
तब तारों की सेना लेकर, चाँद कहाँ से आता है |
रजनी भर तो रंग बिरंगी , छटा खूब बिखराता है |
घटता-बढ़ता प्रतिदिन अपना , नया रूप दिखलाता है |
और भोर होते ही ये सब , जाते क्या पाताल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||

आयी थी पढने लिखने को , बह टैगोर निकेतन में |
क्या क्यों कैसे प्रश्न उभरते , हर पल ही उसके मन में |
जिज्ञासा का केंद्र था उसकी , आसमान और वायुयान |
कितना बड़ा कहाँ तक होगा , कैसे पक्षी भरें उड़ान |
उड़ जाऊं गौरय्या बनकर , तारों के संजाल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||

चन्दा को आउंगी छूकर , तारों से में खेलूंगी |
नील गगन के रंग रहस्यों , को सम्मुख जा देखूंगी |
कैसे टिम टिम करते है ये ,यह भी पता लगाना है |
जितनी अभिनव बातें होंगी , सभी खोजकर लाना है |
भरे पड़े मोती से तारे , आसमान के थाल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||

परिजन न थे सहमत फिर भी , गहरी जिज्ञासा दिखलाई |
चंडीगढ़ में जाकर उसने ,अन्तरिक्ष की शिक्षा पाई |
अमेरीका के नासा में जा , उसने पाया जब प्रवेश |
सपने सारे पूरे होंगे , गर्व करेगा मुझ पर देश |
तैरूंगी ऐसे ही नभ में , मछली जैसे ताल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||

अन्तरिक्ष में प्रथम बार जब , उड़ने का अवसर आया |
महाद्वीप की पहली महिला , बनने का गौरव पाया |
नए नए प्रयोग परीक्षण , वह तो करती जाती थी |
अभिनव राह चुनी थी उसने , उसपर बढ़ती जाती थी |
बिना पंख उडती जाती थी , आसमान विकराल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||

एक बार फिर सोचा उसने , अंतरिक्ष में जाना है |
अभी बचे हैं जो रहस्य भी , उनका पता लगाना है |
नभ ही प्यारा लगता उसको , नभ ही नभ था जीवन में |
नभ को छोड़ कभी कुछ उसने , सोचा न अपने मन में |
हुई विलय भर गयी चेतना , सभी बृद्ध और बाल में |
अन्तरिक्ष वैज्ञनिक बनना था उसको , हर हाल में ||
०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-०-




Please Login to rate it.



You may also likes


How was the poem? Please give your comment.

Post Comment

1 More responses

  • poemocean logo
    Sana Iqbal (Guest)
    Commented on 14-May-2018

    Amazing poem.

Poemocean Poetry Contest

Good in poetry writing!!! Enter to win. Entry is absolutely free.
You can view contest entries at Hindi Poetry Contest: March 2017