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Holi Ka Hurdang

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07 -Mar-2015 Savitri Kala Savi Holi Poems 0 Comments  1,424 Views
Holi Ka Hurdang

होली के हुड़दंग पर डाले हमने सभी रंग |
पर हो न सकी मेरे विश्वामित्र की तपस्या भंग |
वे तो डोलने लगे मेरी ही पड़ोसिन के संग |
जब पी उन्होंने घोट घोट कर लोटा भर के भंग |
एक दिन छत पर खड़ी थी वह नाइन |
हमने पूछा कौन है ?
वे मुस्करा कर बोले मेरी वैलंटाइन |
हमने उस दिन खूब श्रृंगार किया |
उसी पड़ोसिन को साथ लिया |
ये तो थे नशे में चूर |
पड़ोसिन को खिलाते रहे लड्डू मोतीचूर |
वैसे तो मोहल्ले में इनकी इश्क बाजी की चर्चा थी |
हम ही नहीं समझ पाये इनकी क्या इच्छा थी |
हमें लोगों ने बहुत समझाया |
विश्वामित्र की इश्क बाजी से आगाह कराया |
सभी पूछने लगे आये गए |
तुम्हारे पति तुम्हारी ही पड़ोसिन के साथ किधर गए |
तीन दिन के बाद विश्वामित्र जी घर जब लौटे |
तो हाथ में था एक मोटा सा सोटा
तथा एक हाथ में था ताम्बे का लोटा |
साथ में था उसी पड़ोसिन का
बेटा जो था माँ की तरह ही खोटा |
उनको देख कर मेरा कुत्ता गुर्र्या |
उन्हें काटने को दौड़ा दौड़ा आया |
मैने बड़े प्यार से उसे समझया |
मेरा बेटा उसे जंजीर से बांध आया |
ऐसी होली हमने उस वर्ष मनाई |
विश्वामित्र को दारू न पीने की कसम खिलवाई |
कुछ दिनपास के डाक्टर से दवाई भी दिलवाई|
तब ही किसी तरह बचा पाई मै अपना हलवाई |
ऐसा ही होता है होली में हुड़दंग |
सभी हो जाते हैं इसमें बदरंग |
रंगो को भी कर देते हैं बैरंग |
नाचते हैं पड़ोसियों की औरतों के संग |

Holi Ka Hurdang


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