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हम नवोदय से क्यो निकल गए

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02 -Mar-2020 PANKAJ CHOUREY Friendship Poems 0 Comments  274 Views
PANKAJ CHOUREY

खामोशी के पन्नो पर नवोदय की याद लिख दे ,

इन अनसुनी राहों पर आज कोई फ़रियाद लिख दे .

वो कोमल सी निष्पाप हँसी , वो खिलखिलाता सा मन ,

ना जाने इन यादों में , कैसे खो गए नवोदय के दिन !

पलट कर देख, वही महका समां है ,

यादों की करवटों में झूमता जहां हैं .

बचपन की डोर ने जाने कितने रिश्ते हैं बांधे ,

प्यार से , मासूम गांठें हैं बाँधीं .

आज़ाद था मन , आज़ाद थे हम ,

दुःख , पीड़ा , ईर्ष्या , द्वेष , कहाँ जाने थे हम .

दोस्तों की बातें दिल की नजदीकियां बन जाती थीं ,

आपसी तकरार जीवन की नवनिधि बन जाती थी .

क्या थे वो दिन बस यूँ ही गुज़र गए ,

गुमनाम इन राहों में , ना जाने हम नवोदय से क्यो निकल गए !

यादों का संचार है,

जिन पर हमें अभिमान है .

इन यादों को आज मेरा सलाम है ,

जिन यादों में डूबता ये जहां हैं.

हम नवोदय से क्यो निकल गए


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