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" की अब हमे..... अपने ही घर में डर लगता हैं "

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28 -Aug-2020 jagmohan jetha Nature Poem 0 Comments  127 Views
jagmohan jetha

चले थे चांद पर घर बनाने
कुदरत ने किया ऐसा कहर
की अब हमे.....
अपने ही घर में डर लगता है !
अपनों* को कुचल कर चलना
आदत बन गई थी हमारी
दगाबाजी बन गई थी फीदरत हमारी
अब खुद के कर्मो का ही यह खंजर लगता हैं
की अब हमे .....
अपने ही घर में डर लगता हैं !
थोडी सी ख्याति में मदमस्त हो
तरक्की के अहम में
निकल चले थे आसमां चूमने
अब वीरान सा गली, मोहल्ला
और शहर लगता है
की अब हमे.....
अपने ही घर में डर लगता हैं!
दुनिया के भीड़ भरे बाजार में
मजे से जी रहे थे हम
जाने कैसा करवट लिया वक्त ने
की अकेलेपन का सफर ही
बेहतर लगता है
की अब हमे.....
अपने ही घर डर लगता हैं!
*इंसानों



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