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इक ज़िक्र मोहब्बत का.....

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02 -Feb-2019 Rahul Love Poem 0 Comments  248 Views
Rahul

इक ज़िक्र मोहब्बत का था वो कर नही पाएं,
बाद उसके राहत-ए-ज़िगर नही पाएं।

कल रात उनसे ख्वाब में तस्लीम हुई थी,
कल रात भी वो बात उनसे कर नही पाएं।

उनके साथ ज़िंदगी का रंग और था,
उनके बाद अपनी कुछ खबर नही पाएं।

हाय री मजबूरियां की उनके वास्ते,
जीना तो है दूर की हम मर नही पाएं।

अब वस्ल भी होगा तो क़यामत के रोज ही,
इस इंतज़ार के सिवा कुछ कर नही पाएं।



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