उत्तर भारत को चुना, कुहरे ने आवास। सरदी का होने लगा, लोगों को आभास।। -- ऊनी कपड़ों का सजा, फिर से अब बाजार। आमआदमी पर पड़ी, मँहगाई की मार।। -- सरेआम होने लगी, जमकर लूट-खसोट। अब काजू-बादाम से, मँहगे हैं अखरोट।। -- ग़ज़क-रे
मेरी गुल्लक टूट गई मैंने अपने गुल्लक को, सालों से संभाल रखा था, अनेकों अनेक जेबखर्चों को, इसमें डाल रखा था । रिस्तेदारों से मिले, सौ –पचास के नोट भी रखा था, सबकी मीठी यादों को, मैंने इसमें सँजोये रखा था। जैसे ही मोदी
महीना जेठ का का आया, हुई हैं रात अब छोटी बड़ी मुश्किल से मिलती है, मगर दो जून की रोटी श्रमिक को हो गया दूभर. अरहर की दाल को खाना बढ़ी महँगाई तो मजदूर की, किस्मत हुई खोटी उन्हें क्या फर्क पड़ता है, नहीं बाजार जो जाते जि
-१- पूरी दुनिया में हुआ, सस्ता तेल तमाम। लेकिन उस अनुपात में, नहीं घटे क्यों दाम।। नहीं घटे क्यों दाम, मुनाफा कहाँ जा रहा। बतलाओ सरकार, दलाली कौन खा रहा।। कह मयंक कविराय, पूछना है मजबूरी। कौन करेगा आस, यहाँ जनता की प
जनता है मायूस आज सहमी, घबराई, खुशियों का घन घटा, गमों की बदरी छाई.!! मिलेगा कैसे अमन,चैन अब यहाँ सभी को, तंग हुये हालात, आयी ऐसी महँगाई....!! !! मिटा हर्ष, उल्लास जेहन में ग़म का अम्बर, है बेहाल आज जन-जीवन इस वसुधा पर..!! क्यों