Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

जय-पराजय

0
21 -Nov-2016 Shailendra Tomar War Poems 0 Comments  2,158 Views
जय-पराजय

मलिन विजय पाकर क्या हुँकारता है
इस जय को भी, तू जय मानता है

छल से, संसार सारा जीतकर
विष को ही धरा पर सींचकर

गिर कर के पतन में जो तुम
चरित्र का करके हरण ही तुम

अगर लिये भी तो क्या लिये ??
बोझ सारे ही भुवन का तो लिये

एक अर्जुन जब लगा था हारने
कर्ण का ही देख पौरूष सामने

शस्त्रास्त्र निष्फल होते देख अरि पर
बल निज विफल होते देख अरि पर

थकते अपने भुज बल बाहु को
काँपते हुये निज अपने ही पाँव को

पराजित होती , अपनी जब जीत देख
हारते अपने पौरुष को , अरि के साथ देख

बोला तब प्रभु से, वो यों उदास होकर
नहीं प्रभु, नहीं इतने मैं पास होकर

क्यों नहीं हर पा रहा हूँ प्राण उसके
बताईये देव है मुझपे, ये अभिशाप किसके

क्यों मैं आज उससे भय पा रहा हूँ
अपनी जय को ,हारता जा रहा हूँ

कह यों जब अर्जुन खिन्न हो कर बैठता है
तभी कृष्ण वाणी से काल उठ कर बोलता है

क्या सोचता है अर्जुन, तू बस कर्म कर
हाथ में गांडीव ले औ अपना धर्म धर


देख अर्जुन वो सामने ,कर्ण विवशता पा रहा है
रथ चक्र मही में ही अब धसता जा रहा है

उठा धनु , प्रत्यंचा को तान अब तू
शक्ति शरासन पर धर, उसको मार अब तू

विघ्न बाधायें तोड़ के अब , टूट उस पे
बौखलाये बाज सा तू , छूट उस पे

जा उसे आज , काल का तू दर्श दे
यम बन तू , मृत्यु का उसको दण्ड दे

सुन कर इक ऩयी नीति प्रभु से
अर्जुन फिर चला लड़ने ,अरि से

सत्य का जो स्वयं पथ था
धर्म में सदा रहता निरत था

आज जा रहा था ,कुछ त्याग कर के
जाने कौन सा वो खेल रचने

कोई खेल ? शायद! धर्म का था
धर्म का ? या कि अधर्म का था

कौन बताये भला ? क्या है धर्म रण में
शांति क्या है, क्या विध्वंस रण में

बस उठा अरि को वो मारने को
अपना कोई , धर्म पालने को

ले सहारा छल छन्द का उसने
फुँकारा बन फिर भुँजंग सा उसने

निशस्त्र कर्ण पर लगा वो प्रहार करने
अन्तर गरल एक बाण में उतार करके

भेदा कर्ण का हृदय, यूँ कराल उसने
सूर्य को ग्रसा हो, जैसे फिर राहु ने

ले कर छाती पर बाण , अरि तो सो गया
पर जीवन-सुयश अर्जुन , तुम्हारा खो गया

क्या बोलोगे जग को, कौन धर्म युद्ध तुम जूझते़ थे?
सहाय्य किस धर्म का ले, कौन सा धर्म सेवते थे ?

थे भले ही समाज हित में तुमने बाण छोड़े
किन्तु अट्टाहस भर , आज जो स्वर बोले

वो तुम्हारी कुटिलता को , बखानते है
कर्ण के ऊपर जो तुमको मानते है

वे सुने , तुम भी कि ये केवल तुम्हारा भ्रम है
कर्ण के सुकर्मों से ऊपर, तुम्हारा कब धर्म है

भले अनय के पक्ष में था , लेकिन न उसने अपना धर्म छोड़ा
कृष्ण के बोल पर भी न उसने, सुयोधन का संग छोड़ा

जीवन तुमको दान कर के ही गया है
झोली तुम्हारी आज भर कर के ही गया है

जाते हुए भी अपना, वो धर्म निभा कर ही गया
सारे जगत को अपना ,ऋणी बना कर ही गया

© शैलेन्द्र सिंह तोमर



 Please Login to rate it.



You may also likes


How was the poem? Please give your comment.

Post Comment

Poemocean Poetry Contest

Good in poetry writing!!! Enter to win. Entry is absolutely free.
You can view contest entries at Hindi Poetry Contest: March 2017