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जीने की आस

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10 -Apr-2020 Sumit Kumar Sahu Memories Poems 0 Comments  261 Views
जीने की आस

होकर मेरी जान मुझे वो, क्यू अनजान से लगते हैं
कल तक जो अनजान अजनबी थे, आज मेरी जान से लगते हैं
मासूम सी मुस्कान तेरी, दिल में कुछ यूं घर कर जाती है
पा कर खुद को करीब तेरे, इक नया अरमान जगाती है
आ खो जाएं इक बार फिर उन लम्हों में
करें वो शामें कुछ रोशन इस तरह
हो तू मेरे नजदीक इक बार फिर
कर दे सारे गम फना इस तरह
तेरे कदमों की वो आहट तेरे होने का वो एहसास
तेरा यूं सिमटना मुझमें जगाए मुझमें फिर से जीने की आस



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