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जीवन एक अनसुलझी पहेली

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20 -Jun-2020 सुमित.शीतल Life Poem 0 Comments  454 Views
सुमित.शीतल

जीवन एक अनसुलझी पहेली।

नमस्ते एहसास अपनेपन का ग्रुप परिवार।

मैं सुमित अपनी कविता
"जीवन एक अनसुलझी पहेली "
आप सभी के सामने प्रस्तुत कर रहा हूं।

अपना प्यार और सहयोग देकर कृतार्थ करें।

Title: जीवन एक अनसुलझी पहेली।

जीवन भर वो मुस्कराता रहा,

दिन में हंसता और हंसाता रहा।

रात को आंसू बहाता रहा,

अपने गमों को भूलाने की कोशिश नाकाम करता रहा।

दिन में फूलों की तरह खुशबू बिखेरता रहा,

रातें तमाम जिंदगी की होकर परेशान काटता रहा।

रेत का था वो सहमा सा घरोदा,

आंधियों के साये में जीवन गुजारता रहा।

तन-मन-धन से था बेहद मजबूत मगर,

सपने पूरे ना होने का डर सताता रहा।

जीते जी चैन से सोना ना हुआ नसीब,

सब होते हुए भी जीवन था कितना अजीब।

क्यों ना चुनें हम जवां दिलों के टुकड़े,

हर शख्स की किस्मत में वरदान नहीं होते।

जब जुल्म की काली स्याही में गुम हो जाये राही कोई,

होते हैं बदनाम बेशक पर गुमनाम नहीं।

पसीने का स्वाद किसी मेहनतकश मजदूर से पूछो,

छाया में बैठकर अंदाजा लगाते हैं क्यों ।

हर बात समझता है इंसान मगर तब,

जब गुजर जाएगा पानी सर से।।

समाप्त

tc.

सुमित.शीतल



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