Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

कल आज और कल...!!

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विनोद सिन्हा-

आज कुछ शब्द उन बूढे बुजुर्ग माता पिता को उन्हीं के भाव के रूप में समर्पित जो हमारे बागवान बन कर सारी उम्र हमें सींचते हैं,जिनकी उंगलियों को पकड़ हम समय चक्र के पहियों पर बैठ जीवन रूपी सफ़र को तय करते हैं और जब हमें हमारी मंजिल तक पहुँचा, उन्हे उनकी कमजोर हो चुकी हड्डियों को हमारे सहारे की आवश्यकता होती है,जब उनकी कांपती उंगलियों को हमारी मजबूत पकड़ के एहसास की जरूरत होती है हमारे पास समय नहीं होता हाँ हमारे बागवान के लिए हमारे पास वक्त नहीं होता...!!

एक बुजुर्ग पिता की वेदना कहें या अभिव्यक्ति संलग्न चित्र को शब्दों में ढालने की कोशिश..!!

कल आज और कल...!!

हाँ खड़ा हूँ मैं आज
उम्र के उस पड़ाव पर
जहाँ से अगर तुम्हें देखता हूँ
तो तुम बहुत खूबसूरत दिखते हो मुझे.!!

हाँ खड़ा हूँ मैं आज वहाँ
जहाँ से अगर अपनी परछाईयों में
झांक कर देखता हूँ मैं तो
उसमें तुम नजर आते हो मुझे
और नजर आता है तुममें मुझे बचपन मेरा
जहाँ साथ में मेरी जवानी है मेरा बुढ़ापा है
मेरी उम्मीदें हैं मेरे सपनें हैं
और है मेरी अनेकों अनेक ख्वाहिशों के
पूरे और न पूरे होने की
खुशी और कसक दोनो साथ साथ..!!

मगर यह भी उतना हीं बड़ा सच है
कि उम्र भर तुम्हें और तुम्हारे
बचपन के साथ बढता
मैं और मेरा बचपन
कब बूढ़ा हो गया पता ही नहीं चला मुझे
फिर अगर मैं वक्त के रफ्तार में
वक्त के साथ न दौड़ सका
तो मेरा कसूर क्या..??

मेरी इन हड्डियों ने जितना साथ दिया
मैंने तुम्हारा साथ दिया
आज तुम जिसे कमजोर
और अपाहिज समझ
किनारा कर रहे हो
कभी यही तुम्हारे
कोमल हड्डियों का सहारा थें
घंटो घंटो झूलते रहते थे तुम
मेरे इन बाहों में,मेरे इस कांधे पर
जो आज वक्त के साथ कमजोर हो गयें हैं
और आज मुझे जब तुम्हारे सहारे की
आवश्यकता है तो कहते हो
तुम्हारे पास वक्त नहीं..!!

मेरे बच्चे आज तुम मुझे
पर्दे के पीछे से देख कर छुप जाते हो
सोचो तुम्हारे बचपन में मैं तुम्हारे साथ
कितनी- कितनी देर यह खेल खेला करता था
और थक कर भी कभी नहीं थकता था
पर आज जब मैं चाहता हूँ
पल भर को तुम्हारी बाहों में
आराम पाना और महसूस करना
उस पल को और चाहता हूँ समेटना
मैं अपने उस बीते कल को
तो तुम कहते हो तुम्हारे पास वक्त नहीं...!!

आज भी याद है मुझे
जब तुम छोटे थे और न जाने
कितने ऐसे ऐसे सवाल पूछ पूछ कर
मेरा दिमाग खराब किया करते थे
जिनका तुमसे या तुम्हारी उम्र से
कोई लेना देना नहीं होता था
जिनका जवाब दे दे कर
मैं कभी नहीं थकता था
आज तुम मेरे सिर्फ
एक सवाल पर कहते हो
मेरा दिमाग मत खराब करो
मेरे पास वक्त नहीं..!!

आज तुम मुझसे
आँखे चुराते हो दूर भागते हो
चलो स्वीकार कर लेता हूँ मैं
आज तुम्हारे इस सच को भी
पर इस सच से तुम कभी मुँह मत मोड़ना
कि जिस तरह आज तुम मेरा बीता कल हो
मैं भी तुम्हारा आने वाला कल हूँ
कभी वक्त मिले तो मेरे सिर्फ इस
एक सवाल का जवाब सोचना
कि कैसे आँख मिला पाओगे तुम खुद से
उस पल अपने तुम खुद के "कल" से
जो तुम्हारे सामने "आज" खड़ा है
तीनो हीं रूप में तुम्हारे सामने
कल आज और कल बनकर

"सिर्फ एक सवाल"

विनोद सिन्हा "सुदामा"

स्वरचित-दिनांक-१९/१२/२०१७



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To all old people

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