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कलम की कथा

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27 -Apr-2020 PUSHKAR Motivational Poems 0 Comments  141 Views
कलम की कथा

कलम की कथा
1. मै कलम हू कहा से शुरू करू
कहा खतम हु
मै कलम हु
करता हु शुरू
एक बाल्यपन से
जब नन्ही नन्ही हाथो मे
रहकर
उनके मस्तिष्क के
भावों से अनभिज्ञ होकर
खिलोने की तरह
एक कोरे पन्ने पर
अनसुलझी लेखनी बनाता हु
मै कलम हु कहा से शुरू
कहा खतम हु!

समय के चक्रों से चक्रीत होकर
चलता हु थोरा आगे
आता हु उस समय मे
जहा शिक्षा के मंदिर मे
सिसकते
बच्चो के हाथो मे
गुरु के गर्जनो से तब
वर्णों की और बढ़ता हु
मै कलम हु कहा से शुरू
कहा खतम हु

आती है अब वह बारी
जहा पे मेरी अपेक्षा
थोरि बढ़ती है
परीक्षाओ से लेकर मै
परिणाम तक बढ़ता हु
उंगलिया थक जाती है
पन्ने पूर्ण हो जाते है
पर मेरा क्या
मेरा तो काम है चलना
निरंतर चलता ही जाता हु
मै कलम हु कहा से शुरू
कहा खतम हु मै कलम हु

फिर मै कही दिखता
हु किसी साहब
के जेबों मे
कही हो फैसला लिखना
वही पर काम हो अपना
पर कही कही घबराता हु मै
किसी कोर्ट जाने से
जहा पर न्यायोचित ठहराने
किसी की मोत को लिखना
पर क्या करू मै
मेरा कर्तव्य है अपना
मुझे तो है निरंतर चलना
कलम हु मै कहा से शुरू
कहा खतम हु

हरेक मानव को मै
अपने से जोरे रखता हु
उसके जीवनी से लेकर
उसके अंत का सामान लिखता हु
फिर क्यू अंत मै फिर भी मैं रुकता नही?
फिर किसी नन्ही हाथो का
सहारा ले लेता हु
और फिर चलता ही जाता हु
मै कलम हु कहा से शुरू कहा खतम हु

कलम की कथा


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