Latest poems in Hindi & English on Republic day, India Gantantra Diwas, 26 January

Kalyug Ke Murge

0
08 -Dec-2015 Prabhudayal Shrivastava 2 October Poems 0 Comments  1,644 Views
Prabhudayal Shrivastava

रोज चार पर मुर्गों की अब,
नींद नहीं खुल पाती बापू|
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू|

कुछ सालों पहिले तो मुर्गे,
सुबह बाँग हर दिन देते थे|
उठो उठो हो गया सबेरा,
संदेशा सबको देते थे|

किंतु बात अब यह मुर्गों को,
बिल्कुल नहीं सुहाती बापू|
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू|

हो सकता है अब ये मुर्गे,
देर रात तक जाग रहे हों,
कम्पूटर टी वी के पीछे,
पागल होकर भाग रहे हों|

लगता है कि मुर्गी गाकर,
फिल्मी गीत रिझाती बापू|
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू|

नई सभ्यता पश्चिमवाली,
सबके सिर‌ चढ़ बोल रही है|
सोओ देर से उठो देर से,
बात लहू में घोल रही है|

मजे मजे की यही जिंदगी,
अब मुर्गों को भाती बापू|
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू|

पर पश्चिम की यही नकल तो,
हमको लगती है दुखदाई|
, |भूले अपने संस्कार क्यों,
हमको अक्ल जरा न आई|

यही बात कोयल कौये से,
हर दिन सुबह बताती बापू|
इस कारण से ही तो अब वे,
गाते नहीं प्रभाती बापू|



 Please Login to rate it.



You may also likes


How was the poem? Please give your comment.

Post Comment

Poemocean Poetry Contest

Good in poetry writing!!! Enter to win. Entry is absolutely free.
You can view contest entries at Hindi Poetry Contest: March 2017