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करबटें बदलता हूँ (A inspirational poem)

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26 -Aug-2016 anupam chaubey Sad Poems 0 Comments  926 Views
anupam chaubey

करबटें बदलता हूँ रात भर मैं जलता हूँ
जख्म दिए औरों ने पर मैं खुद ही सिलता हूँ

मुँह मोड़ लिया हो अपनों ने तोड़ दिया हो सपनों ने
हर बार मगर हँसकर सबसे अक्सर मैं मिलता हूँ

जिन गलियों में बस शूल मिले यादों की बस कुछ धूल मिले
कभी रहे काशी काबा में हर रोज मैं पैदल चलता हूँ

वक्त के इस दौर में निकला मैं जिस भी ओर में
सदा बचा मैं शोलों से पर पानी से मैं जलता हूँ

सुबह भी देखी थी निराली पल भर में जो हुई थी काली
जिस धुंध में जग ये सोता है मैं उन रातों में पलता हूँ

उस फूल के जैसा मेरा मुकद्दर जो मसल दिया जाता है
अंजाम मुझे भी मालूम है फिर भी हर रोज मैं खिलता हूँ



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