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कठपुतलियां

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15 -Jul-2021 Sharma Politics Poem 0 Comments  171 Views
Sharma

कठपुतलियां
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कठपुतलियों का
अपना कोई
वजूद नही होता !

पर्दे के पीछे से
मिले इशारे पर
उछलती कूदती
और नाचती हैं
कठपुतलियां !

कैसे नचाना है?
कितना नचाना है?
कब नचाना है?
बस नचाने वाले के
हुक्म को बजाती हैं
कठपुतलियां !

पाश्र्व भाग में छुपे हाथ को
बस इशारा भर करना होता है
ओर फिर मचल पड़ती हैं
कठपुतलियां !

स्वाभिमान नही जानती
जब मर्जी घुटने टेक सकती है
जब मर्जी बौने कद्द को छुपाने
उछल सकती हैं
धागों के ताने बाने में उलझी
कठपुतलियां !

परवश होतीहैं
फिर भी थकती नही
भूखी प्यासी
दर्शकों का
खूब दिल बहलाती हैं
कठपुतलियां !

हर गांव
हर कस्बे में
नाच दिखाती
गर्व से इतराती के
मिल जाती हैं
बेचारी कठपुतलियां !
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ज्ञान चंद(हि0प्र0)
15 जुलाई,2021



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