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खान ज़िन्दगी।

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13 -May-2019 anuradha thalor Life Poem 0 Comments  92 Views
anuradha thalor

आज मैं थक गई हूँ इस बेजार सी जिंदगी से लड़ते हुए
हर बार तो गिरकर उठ जाती हूँ एक खाक सी उम्मीद करते हुए।

कभी कभी सोचती हूँ ये सिलसिला कभी भी खत्म नहीं होगा
कभी कभी सोचती हूँ शायद इससे बुरा कुछ नहीं होगा
कभी कभी सोचती हूँ शायद, शायद ये आखिरी घाव होगा
सुना है खुदा सबकी सुनता है, तो मेरी सुनवाई का भी कोई रास्ता होगा।

कभी कभी सोचती हूँ रिश्तो में मैं इतनी कच्ची क्यूँ हूँ
चाहे जितनी मजबूत कलम से रिश्ता लिखना चाहूँ
हर बार, हर बार उस खाक रिश्ते के लिए जुझती क्यूँ हूँ।
कभी कभी सोचती हूँ शायद मैं रिश्तो के लिए बनी ही नहीं हूँ
शायद इसीलिए अब तो हर रिश्ते के लिए खौफजदा हूँ।

कभी कभी सोचती हूँ शायद मासूमियत बड़ी नुकसानदेह चीज है
शायद इसीलिए मुझे इस ज़िन्दगी और खुदा से इतनी खीझ है
कभी कभी सोचती हूँ सब कुछ हार कर भी थोड़ा सा जी लूँ
हर रिश्ते में मिले जहर को बस एक घूँट में ही पी लूँ ।
आज मैं थक गई हूँ ........



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