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ख़ौफ़ और ज़िंदगी

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16 -May-2020 श्याम'कवि' बैरागी Natural Disasters Poems 0 Comments  552 Views
ख़ौफ़ और ज़िंदगी

"ख़ौफ़ और ज़िंदगी"

ये अलस्सुबह से ही क्यों,शामें ढलने लगी हैं,
ख़ौफ़ में अब,रूहें भी लिबास बदलने लगी हैं

आकर सड़कों पर, अब सफर जम गया है,
रास्ते थम गए हैं, अब मंजिलें चलने लगी हैं।

मानो ठहर गया है वक़्त भी अपने ही घर में,
फिजाएं भी अपने ठिकाने बदलने लगी हैं।

दिन के उजालों ने ख़ौफ़ भर दिया है क्या?
अब खामोश रातें भी अंधेरे में चलने लगी हैं।

सोच रहा हूँ आजकल, कि क्या सोचूँ,
बेचैनी,अपने हाथों से,आँखे मलने लगी हैं।

उड़ेल ग़या है कोई, ख़ौफ़ का ज़हर दिल में,
साँसें हिम्मत की भी,अब फिसलने लगी हैं।

जिन साँसों को जीना है,वो आशियाँ ढूँढ लेंगी,
मौत के साये में,ज़िंदगी फिर पलने लगी है।

ताउम्र लड़कर,आखिर मौत को हरा देती है,
ये जिंदगी है,लड़खड़ाकर,फिर संभलने लगी है।

©✍ श्याम'कवि' बैरागी
  इंदौर, म. प्र.
9826917148
(स्वरचित एवं मौलिक)



Dedicated to
कोरोना योद्धाओं और विजेताओं को

Dedication Summary
कोरोना योद्धा जो इस महामारी से लड़े और जीते उन सभी को मेरी कविता समर्पित है।
आज जो लोग घरों के अंदर बैठकर इस युद्ध मे डटे हुए हैं, उन सभी को
मेरा सलाम।

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