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खिड़की

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02 -Mar-2019 Suresh Chandra Sarwahara Human Being Poems 2 Comments  194 Views
Suresh Chandra Sarwahara

आओ घर की खिड़की खोलें।
बाहर कितने घर हैं सुन्दर
लोग बसे हैं जिनके अन्दर,
चौपाये चलते धरती पर
पंछी उड़ते पर फैलाकर।
संग इन्हीं के कुछ पल डोलें,
आओ घर की खिड़की खोलें।
देखो वह बच्चा रोता है
कौन वहाँ भू पर सोता है,
कितना है वह दुर्बल मानव
किन्तु बोझ भारी ढोता है।
इनसे कुछ बतियाएँ बोलें,
आओ घर की खिड़की खोलें।
दूर गगन में घिरते बादल
कली कली पर भँवरों के दल,
पेड़ - पेड़ घूमे मधुमक्खी
फूलों पर है तितली चंचल।
हम भी मन की खुशियाँ तोलें,
आओ घर की खिड़की खोलें।
साफ करें हम घर के जाले
खोलें मन के जकड़े ताले,
निकलें हम अपने परदों से
देखें बाहर हुए उजाले।
सब अपने हम सबके होलें,
आओ घर की खिड़की खोलें।
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लेखक : सुरेश चन्द्र 'सर्वहारा'



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2 More responses

  • poemocean logo
    Ankita Singh (Guest)
    Commented on 03-March-2019

    Bahut Sundar ..

  • poemocean logo
    Ankita Singh (Guest)
    Commented on 03-March-2019

    Bahut Sundar ..

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