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कोई पहचान ले जरा...

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22 -Sep-2017 Aakash Parmar Life Poem 1 Comments  1,379 Views
Aakash Parmar

दौड़ रहा हूं अंधेरी राहो में,
कोई रोशनी दिखाई तो दे जरा,
कितने कांटे है राह में मेरी,
अपनी नजरों से कोई देखे तो जरा,
पग-पग पर छल कपट है,
डगर-डगर है संघर्ष,
सीख रहा हूं जीना ज़िन्दगी से,
विचारों से निकाल रहा हूं निष्कर्ष,
सीख रहा हूं गिरकर मैं उठना,
चाह ना मंजिल की देने टूटना,
अकेला नही हूं राह में अपनी,
साथ लिए हूं उम्मीद एक कल की,
बदल लूंगा जोश में,
मैं दर्द से निकली अपनी कराह,
दौड़ रहा हूं जिन अंधेरी राहो में,
बस कोई पहचान ले जरा।

आकाश सी अनंत जिज्ञासाओं में,
मन की बेरस अभिलाषाओं में,
उलझन सी हो गयी ज़िन्दगी,
खुद को पल-पल सही बताने में,
कुछ इस तरह से खेलने लगे है लोग,
मजबूरियों में हालातों से,
गिरा रहे हर बार मनोबल,
करके झूठी बातों से,
हर मोड़ पर खड़े है,
पहने मुखोटा वफादारी का,
नजर अंदाज कर यथार्थ को,
मांग रहे प्रमाण ईमानदारी का,
दर्द अभी भी है जहन में,
ना अभी तक कोई घाव भरा,
दौड़ रहा हूं जिन अंधेरी राहों में,
बस कोई पहचान ले जरा।



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1 More responses

  • poemocean logo
    Gagan Barola (Guest)
    Commented on 30-September-2021

    It's motivated version, I love the context and the style of language used .

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