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कुंती ----कर्ण संवाद

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20 -Jan-2021 Parmanand kumar Spiritual Poems 0 Comments  626 Views
Parmanand kumar

कुन्ती और कर्ण संवाद
""""""""""""""""""""" By Parmanand kumar.




कुंती:___

सुन कर्ण तू कर्ण नहीं
मेरा सुत ,तुम कौन्तेय हो !

पांडवों से भी ज्येष्ठ तुम्ही हो
रे अभागे, मैं ही तेरी जननी हूँ !

राजगद्दी भी तुम्हें मिलेंगी
युधिष्ठिर का तुम अग्रज़ हो !

गर कुरूक्षेत्र में ,न जा तुम
अर्जुन के विरुद्ध ,युद्ध करने को !

मैं माँ हूँ ,मेरी ममता का
तू लाज़ बचा ले, तू तो बड़ा दानी हो !

कुरुवंश का तू भी वारिस
ये राज़ बता दूँगी सबको !

तू मेरे जीवन की ख्वाहिश
दुर्वासा ऋषि के मंत्र परिणाम हो !

तू सुत पुत्र नहीं, सूर्य पुत्र हो
तू पांडवों का ही गोत्र हो!

लोक लाज़ मैं तोड़ के अब
हक तेरा भी दिलवाऊँगी !

कर जोड़ी ,करूँ विनती तेरी
तू पांडव की प्राण बचा लो !

कर्ण:___

माँ कठोर होती है इतना
जनमानस कहाँ माना था !

अब मुझको शक नहीं है तुझ पर,
माँ , सचमुच निष्ठुर होती है !

देख ख़ुशी बड़े बेटे का
तुमसे सहा नहीं जाता क्यों ?

भरी सभा में तड़प रहा था
कहाँ थी ममता, चुपके से क्यों ?

राजघरानो में....राज- ममता
क्यों न छल्काई तुम मेरे लिए ?

अब गुजर गया वो वक़्त , हे माते !
मैं वक़्त का कर्जदार हूँ...

भरी सभा में जो इज़्ज़त दी है
उसी दुर्योधन का मैं आज ऋणदार हूँ. !

ऋण चुका के शेष बचुङ्गा
तब माँ, मैं तेरा पुत्र कौन्तेय हूँ !

वचन दिया _मैं, युद्ध भूमी में
अर्जुन छोड़, किसी को न मारूँगा !

तुम पांडवों की माँ हो ,माते !
ये शेहरा न तुझसे कभी छिनूंगा !
कर्ण वचन यह देता है
अब तु मुझे कृतज्ञता से मरने दो.... !!

जीवन की अंतिम अभिलाषा है
अर्जुन का अंतिम संस्कार करने दो !

या उसके सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर होने का
ब्रह्मांड को मुझे ही प्रमाण देने दो !!

........................................

कुंती ----कर्ण संवाद


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