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मतदान: क्यो बिक जाता मतदाता

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03 -Dec-2018 Abbas Bohari Politics Poem 0 Comments  209 Views
Abbas Bohari

पिता पर गुज़रता भारी, कन्यादान
हम भारतीय यूंही कर देते, मतदान

आज रवि हुआ, क्या पश्चिम से उदय
बरसो बाद जो पधारे, नेताजी महोदय

आ गया चुनाव, प्रहरी दे रहा दस्तक
बैठे घात लगाए, कर दो देश हस्तक

फ़िर वही वादे, जता रहे अपने इरादे
हम आम अवाम, है जैसे इनके प्यादे

अबकी बार बना दो, फ़िरसे सरकार
करेंगे अबके, सबके सपने साकार

गरीब मांगे, बस दो वक्त की रोटी
सर पर छत हो, पहननेको लंगोटी

किसान चाहे, ऋण में भारी कटौती
मिले उपज के दाम, ये चिंता सताती

नौकरपेशा ही भर रहा, पूरा आयकर
व्यवसायी अप्रसन्न, कर पर कर भर

छू रही आकाश, खाद्य चीजों की दरे
जमाखोर भर रहे गोदाम, बिना ड़रे

रात दिन फ़िसल रहा, रुपये का मूल्य
मज़बूती से हो, अर्थव्यवस्था का शल्य

मत बहलाओ हमे, मन्दिर मस्जिद के नाम
एकही है ईश्वर अल्लाह, मत करो बदनाम

उद्योगपति करते नही, किसीकीभी दरकार
भरती रहती तिजोरियां, हो जिसकी सरकार

धर्मगुरु बाबा महंत साधु दिखाते, सब रंग
अंधभक्तों को भिड़ाते करने, आपसमे जंग

क्यो बिक जाता मतदाता, एक गुलाबी पत्ती
नोचकर सबके मुखौटे, बुझा दो इनकी बत्ती

अब्बास सोच रहा, किसको दे कीमती वोट
खड़े सारे, धर्म जाती प्रांत भाषा की लिए ओट



Dedicated to
ज़ुल्फेकार भाई

Dedication Summary
मेरी ये रचना अपने बड़े भाई ज़ुल्फेकार भाई को समर्पित करता हूं, जिन्होंने राजनीति और नेताओंको करीब से देखा और समझा है

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