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Machhali Ka Jeevan Aur Ant

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19 -Sep-2013 Narendra Dagar Life Poem 0 Comments  1,569 Views
Narendra Dagar

मछ्ली का जीवन और अंत
मैं मीन महीन बिन बसेरा की
जल मेरा घर, खेल का मैदान
कभी इधर कभी उधर झकझोले मैं
न जाने कहाँ और किस ओर पहुँच जाऊँ II
मेरा पूर्ण परिवार सफर में साथ
खेलती कूदती उमंगों में सबके साथ
कभी किनारा भी पकरूँ तो गहराई मेँ भी जाऊँ II
पता नहीं कब तक ये खुशियाँ रहें
न जाने कब हो जाए हादसा
मछुआरे के हाथ से किसी बड़े शहर
की मंडी के फुटपाथ पर भी पहुँचा दी जाऊँ II
वो दिन भी आ गया,तड़पती बिलखती मंडी में
खरीदार आए, कोई उल्टे कोई पल्टे
किसी ने कहा अच्छी है किसी ने “ना” कहा
“ना” कहने वाले को निहारा, सोचा बच जाऊँ II
कहा मुझे मेरे बसेरे पर छोड़ दो
ना सुनी और परोस दी गई
सफर की शुरुआत सुंदर अंत दुखदायी पाऊँ II
नरेन्द्र सिंह डागर



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